मैंने पंडित को नाकार दिया

मैं खूब पाठ-पूजा करता था 

मैंने MA करते ही एक सिखों की संस्था में अध्यापक के रूप में काम शुरू किया। मेरी तनखाह तब सिर्फ 1600 रुपये प्रति माह थी। वह स्कूल पहाड़ो में एक घाटी में था इसलिए वहां ठण्ड बहुत पड़ती थी। वह स्कूल बाकी समाज से लगभग कटा हुआ था क्योंकि यह स्कूल एक बहुत दूर पहाड़ों में गहरी घाटी में था। यातायात के साधन कुछ है नहीं थे। डाक भी वहां कई दिनों में पहुँचती थी। कोई आस-पास बाजार भी नहीं था। मैंने वहां बहुत मेहनत करनी शुरू कर दी यही सोचकर की मेहनत रंग लाती है।  मैं उनके दरबार में भी जाता, खूब पाठ-पूजा भी करता। दरअसल मैं अपनी मेहनत में कोई कमी नहीं छोड़ना चाहता था।

मुझे शुरू में जो बच्चे दिए गए वो निहायत ही उद्दंड और निक्कमे थे। और ऊपर से एक यह समस्या थी की चाहे मैं अंग्रेजी में MA था लेकिन मेरे से तीसरी कक्षा की अभ्यास पुस्तिका हल नहीं हो पाती थी।

मैं वहां खुश नहीं था

लेकिन मैंने दूसरे अध्यापको से बहुत कुछ सीखा और जब मैंने वहां दो साल बिता दिए तो मुझे लगा कि मैं यहाँ खुश नहीं रह सकता। वहाँ वो लोग हर आदमी पर शक करते थे, हर आदमी की घर से आयी चिठियाँ पढ़ ली जाती थी। यहां तक जब मेरी मंगनी हुई तो वो लोग मेरे होने वाली पत्नी की आयी हुई चिठियाँ पढ़ने के बाद ही मुझे देते थे।

मैं दुनिया से कट चुका था

तो ऐसे माहौल में कोई वहाँ कैसे खुश रह सकता है? अगर आपने उनसे दो दिन की छुट्टी मांग ली तो समझो आपने उनको गाली दे दी। जिंदगी बहुत मुश्किल थी वहां। बस काम ही काम था वहाँ और कुछ नहीं था। आप सारी दुनिया से कट जाते हो, आप आगे कोई पढ़ाई नहीं कर सकते। आप बाहर की दुनिया के लोगो से संवाद नहीं कर सकते। इसलिए मैंने उस जगह को 2 साल की अथक मेहनत करने के बाद छोड़ने का फैसला किया। इसके बाद मैं मैदानी क्षेत्र अपने घर आ गया और वहां नौकरी करने लगा। मेरी शादी भी हो गयी और हम दोनों एक स्कूल में लग गए।

मेरा बैक बैलेंस जीरो रहता था

तनखाह तो कम थी लेकिन अब हमारे पास जयादा आजादी थी। यहां हमने बहुत अच्छी-अच्छी नौकरियां की लेकिन 6-7 साल के बाद भी कोई बहुत बढ़िया नौकरी नहीं मिली। हमारा बैंक बेलेंस जीरो ही रहता था। अपना घर भी नहीं था। हमेशा किराये पर रहना पड़ता। काफी निराशा थी जीवन में। सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करते तो कभी बात नहीं बनती। कभी-कभी लगता की हमने कहीं वो पहाड़ो वाली नौकरी छोड़कर गलती तो नहीं की। शायद वहाँ होते तो एक ठीक ठाक बैंक बैलेंस तो होता क्योंकि वहाँ रहना और खाना पीना फ्री था। याद रहे भारत में सरकारी नौकरी पाना लोगो का बहुत बड़ा सपना रहता है।

मैं फिर वापिस जाना चाहता था

हम दोनों फिर एक बार उस पुरानी नौकरी के बारे में सोचने लगे कि चाहे वहां जीवन नहीं है लेकिन पैसा तो बचता है। क्यों न 10 साल बाद वापिस जाया जाये। अब तक मेरा बहुत से अच्छे विद्यालयों का अनुभव भी हो चुका था। मुझे लगता था अब वो लोग मुझे प्रिंसिपल भी बना सकते है और तनखाह भी अच्छी होगी। लेकिन यह फैसला बहुत मुश्किल था। एक दम सारी दुनिया को छोड़कर एक छोटी सी जगह पर सिमिट जाना। सब कुछ छोड़कर उनका हो जाना। अपनी सारी ख्वाहिशों का दमन कर देना। एक ऐसी जिंदगी जिसमे पैसा तो होगा लेकिन बाकी कुछ नहीं होगा।

हम एक पंडित के पास गए

इतने में मेरी पत्नी ने एक दिन कहा की मैंने एक ऐसे पंडित के बारे में सुना है जो भवष्य के बारे में बिलकुल सच बता देता है। मुझे भी लगा कि उस पंडित (पादरी) को मिलना चाहिए। शायद वह हमें सही मार्गदर्शन दे पाए कि हमें आगे क्या करना चाहिए? बहुत मशहूर पंडित था वह। हम उसके पास गए। उसने हमसे 500 रुपये लिए। वह अंदर कैबिन में बैठा हुआ था और उसने मुझे एक पर्ची दी और मुझे कहा कि बाहर बैठकर इस पर्ची पर अपनी कोई तीन इच्छाएं लिखकर लाओ। मैं बाहर गया और पर्ची पर अपनी तीन सबसे बड़ी इच्छाएं लिखी और अंदर पंडित के पास वापिस आ गया।

पंडित ने मेरे दिल की बात बूझ ली

पंडित ने कहा की पर्ची को उसको दिखाना नहीं बस अपने हाथ में रखो। उसने फिर यह कहा कि आपकी पहली इच्छा जो आपने लिखी है वह यह है कि आपको एक सरकारी नौकरी मिले। मैंने कहा, “हाँ, बिलकुल यही मैंने लिखा है” फिर उसने कहा कि आपने जो दूसरी इच्छा लिखी है वह यह है कि आपका अपना घर हो। मैंने कहा, “हाँ, बिलकुल मैंने यही लिखा है” फिर उसने मेरी तीसरी इच्छा भी मेरी बता दी जो मैंने पर्ची पर लिखी थी। मैं बहुत हैरान हुआ कि पंडित को कैसे पता चला कि मैंने पर्ची पर क्या लिखा था? मैंने उसके सामने तो कुछ लिखा ही नहीं था।

फिर उस पंडित ने मुझे यह पूछा कि मैं और क्या जानना चाहता हूँ? मैंने कहा कि मैं एक असमंजस में हूँ

सरकारी नौकरी मेरी किस्मत में नही थी

क्योंकि पिछले 10 साल से सरकारी नौकरी तो मिल नहीं रही। तो पंडित जी आप यह बताओ कि मुझे यही रहकर सरकारी नौकरी पाने के लिए कोशिस करनी चाहिए या फिर मुझे पहाड़ो में वापिस चला जाना चाहिए क्योंकि वो मुझे प्रिंसिपल तो बना ही देंगे। पंडित जी बोले कि तुम वापिस पहाड़ो में ही चले जाओ। सरकारी नौकरी आपकी किस्मत में नहीं है।

लेकिन मुझे बढिया नौकरी मिल गयी

मुझे काफी धक्का लगा कि मेरे नसीब में सरकारी नौकरी नहीं है और दूसरी तरफ वहां पहाड़ो में सारी उमर जीवन बहुत मुश्किल रहने वाला है। मैं काफी मायूस हुआ। घर आकर मैंने अपनी पत्नी से काफी विचार विमर्श किया और यह फैसला लिया कि हम पहाड़ों में नहीं जायेंगे। यही रहेंगे। मैं संघर्ष करता रहा और जहाँ भी सरकारी नौकरी निकलती मैं आवेदन कर देता। कभी एक स्कूल से निकाल दिया जाता तो मैं दूसरे में लग जाता। ऐसे ही 10 साल निकाल गए और एक दिन आया जब मुझे कॉलेज में प्रोफेसर की नौकरी मिल गयी।

पंडित ने मुझे भ्रमित किया था

अब अगर मैं उस पंडित की बात मान लेता तो सोचो जीवन कैसा होता? उस घाटी में जो स्कूल था वहां जीवन नर्क से कम नहीं था। मैं अगर वहां चला जाता तो मेरे जीवन से सारी संभावनाएं ख़त्म हो जानी थी। क्योंकि वह इलाका बाकि समाज से कटा हुआ है। मैं भी पंडित पर विश्वास कर सकता था। उस पर विश्वास करने का बहुत बड़ा कारण था की उसने आपने आप को बहुत बड़ा विद्वान सिद्ध कर दिया था। ऐसा लगता था कि वह सब कुछ जानता था। उसने शक की कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ी थी। जो आदमी आपके दिल की बात बिलकुल सही से बता दे वह आपको गलत क्यों बताएगा। उस पंडित पर विश्वास न करने का कोई कारण ही नहीं था।

मैंने खुद पर भरोसा किया

उस पंडित पर भरोसा करने का मेरे पास पुख्ता कारण मौजूद था। तथ्य सामने थे कि वह बहुत बड़ा विद्वान है लेकिन मैं इन तथ्यों के विरुद्ध गया। सब कुछ जानते हुए भी मै उल्ट दिशा में गया। मैंने रूल को तोडा।  मैंने उस पंडित की बजाय अपने आप खुद पर भरोसा करना मुनासिब समझा। जो सच लग रहा था वह वास्तव में झूठ था। और दूसरी तरफ, जो अभी नहीं जन्मा था असल सच तो वह था।

पंडित की मानता तो बर्बाद हो जाता

अगर मैं उस पंडित के कहने से वापिस पहाड़ो में चला जाता तो निश्चित ही मैंने आगे पढ़ाई छोड़ देनी थी क्यों वहां जाने का मतलब आगे के सारे रास्ते बंद। सारी दुनिया से सम्बन्ध विच्छेद हो जाने थे। वहां मैंने ना तो और पढ़ाई करनी थी और ना ही मैं किसी अच्छी नौकरी के लिए आवेदन कर पाता क्योंकि वो लोग ये सब नहीं करने देते। बाद में मुझे खुद ही यह अहसास होने लगना था कि पंडित ने सही कहा था की आपकी किस्मत में सरकारी नौकरी नहीं है।

जब मैं उन पहाड़ो वाले स्कूल में 20 साल पढ़ा चुका होता, सोचो जीवन में कोई रस नहीं रहना था,कोई उमंग न बाकी बचती, सारी आशाएं मर चुकी होती तो मुझे जरा सा भी आभास नहीं होना था

फिर पंडित ने सही सिद्ध हो जाना था

की मैंने उस पंडित की बात मानकर कोई गलत काम किया। बल्कि मुझे यह अहसास होना था कि पंडित ने बिलकुल सच बताया था । जो उसने बताया वही हुआ क्योंकि वहां जाकर फिर मुझे सरकारी नौकरी तो मिलनी नहीं थी। सोचो जीवन से कितनी बड़ी बेइंसाफी हो गयी होती। एक झूठ ने सच बन जाना था और मैं फिर मैं यह समझता की मेरे जैसा बुद्धिमान कोई नहीं जिसने वक्त रहते पंडित की बात मान ली।

मैंने अपने दिल की आवाज सुनी

देखिये मैं लहरों के विरुद्ध गया और एक ऐसा सत्य पैदा किया जो मुझे चाहिए था। अगर मैं पंडित की बात मन लेता तो फिर मैंने सिर्फ पंडित के सत्यो को दोहराना था और ऐसा करके मैंने सिद्ध कर देना था कि देखो मुझे सरकारी नौकरी नहीं मिली। और फिर पंडित ने भी तो यही कहा था कि नौकरी नहीं मिलेगी। फिर पंडित ने भी सही साबित हो जाना था और मुझे भी कि जैसा सोचा था बिलकुल वैसा ही हुआ देखिये, आप अपनी मर्जी का जीवन तराश सकते हो अगर आप बाहर की आवाजें न सुनों। आपको अपने अंदर की आवाज को सुनना है। वही आपका सही मार्गदर्शन करेगी। आपने आज तक के हर सत्य को झुठलाना है जैसे मैंने पंडित को गलत सिद्ध कर दिया #bTr

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.