बदलाव क्यों जरूरी है?
हमारी ज्यादातर संस्थाएं हमारे गले की हड्डी बन जाती है।

To personal excellence you need to work on personal and social transformation

सोचो रोजगार दफ्तर शायद आज भी चल रहे है

जबकि उनके जरिये अब किसी को रोजगार नही मिलता।
सोचो जितने सरकारी कॉलेज है स्कूल है
उनमें से निकले बच्चो को आज शायद ही नौकरी मिले।
मेरे पड़ोस में हिमाचल में एक आद्योगिक क्षेत्र है
जहां B Tech बच्चे आठ आठ हजार में नौकरी कर रहे है।
 
जब B Tech बच्चो को आठ हजार की नौकरी है
तो सरकारी कोलजो और स्कूलों के बच्चे जो सिर्फ स्नातक होते है
तो उनको तो कोई तीन हजार की नौकरी भी नही देगा।
 
जितने हमारे ITI है उनमें से निकले बच्चो को कोई नौकरी नही मिलती
क्योंकि उनको कोई व्यवहारिक ज्ञान नही दिया जाता।
आज ज्यादातर स्कूल कॉलेज, आई टी आई, पोलेटकनीक
सब डिग्री बांटने वाली संस्थाए है
क्योंकि ज्यादातर बच्चो को नौकरियां नही मिलती।
 
अब जब परिणाम ही नही
तो इन संस्थाओं को बंद करके कोई नई शुरुवात क्यों नही की जाती।
स्नातक की जगह बच्चो को बा

हरी तक
क्यों नही किसी खास क्षेत्र की महारत दी जाती
ताकि बाहरी पास करके ब
च्चा कम से कम अपनी रोटी तो कमाने लगे।
 
लेकिन किसी के पास इस बारे में सोचने का वक्त नही।
जानता भी इस सड़े गले सिस्टम की आदि हो चुकी है।
सोचो अगर आप सिर्फ साठ साल पुराने सिस्टमो को ब्रेक लगाकर
कोई नई राह नही ढूंढ़ सकते
तो लाखों साल पुराने धर्म का कोई नया विकल्प कैसे चुनोगे?
 
चीजें समय के अनुसार जम जाती है
और फिर यह बात मायने नही रखती कि वो गलत है या ठीक।
फिर आदमी इनका आदि हो जाता है।
इस आदतन व्यवहार को हम रूल में बंधना कहते है।
एक गहरी मानसिक जकड़न है, गुलामी है।
 
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