बदलाव क्यों जरूरी है?

जब मेरी धर्म में कोई आस्था ही नहीं
तो फिर मैं धर्म पर रोज रोज चर्चा क्यों करता हूँ?
ऐसा विचार मेरे मन में बहुत बार आता है ।
और जब मुझे पता चल गया कि धर्म क्या है या क्या नहीं
तो फिर वही अपनी मानसिकता लोगों पर क्यों थोपना चाहता हूँ?
यह एक दूसरा सवाल है।
 
पहली बात तो यह समझ लेनी चाहिए
कि अगर आप लाख ठीक है
लेकिन अगर समाज की मानसिकता गलत है
तो यह आपको जरूर प्रभावित करेगी,
आप इससे बच नहीं सकते।
यह ऐसे ही है जैसे कोई सड़क पर शराब पीकर गाडी चला रहा है
यह अब उसका निजी मामला नहीं,
अब यह एक सर्वजनिक मामला है।
उसकी गलती से आपकी जान भी जा सकती है,
चाहे आप लाख सही ड्राइविंग कर रहे हो।
 
अब यह सबका सती प्रथा में अटूट विशवास था
कि हर विधवा को न चाहते हुए भी सती होना पड़ता था।
सती होने वाली औरत का तो कोई दोष नहीं था,
दोष था लोगों की त्रुटि पूर्ण सोच का।
अगर आपके पड़ोस में आग लगी है
तो यह आपके लिए भी चिंता का कारण है
क्योंकि आग की लपटे आपको भी जला सकती है।
यही कारण है
मैं दिन-रात समाज की रुग्ण सोच का उपचार करने की कोशिश में हूँ।
 
यह समाज का अंधविश्वास ही है
कि हमें आज भी इतनी निकम्मी शिक्षा मिल रही है।
यह समाज की सामूहिक सोच ही है
कि मैं आज तक शुद्ध दूध नहीं प्राप्त कर सका।
यानी दूसरों की सोच आपको प्रभावित करती है।
 
यह तो तय है कि आपको समाज की सोच पर
काम तो करना पड़ेगा।
वह भी तब जब
आप अपनों बच्चो के भविष्य के बारे में सोचते हो ।
मैं तो इस समाज में किसी तरह से जी लूंगा,
लेकिन जब मैं जब यह सोचता हूँ कि इसमें मेरी बेटी कैसे जिएगी,
तो मैं निराश हो जाता हूँ।
 
अब सुधार करने का हक़ किसको है?
जोगा सिंह को किसने अधिकार दिया
कि वह हजारो सालो से चले आ रहे धर्म पर चोट करे?
जोगा सिंह तो कल का बच्चा है
और धर्म और धर्म गुरु तो प्राचीन है।
और जो मैं बातें कहता हूँ,
उससे ज्यादातर लोग सहमत नहीं होते
क्योंकि मेरी बातें आपके हजारों साल पुराने पवित्र विश्वासों पर
चोट करती हैं।
 
अब राजा राम मोहन राय ने भी तो
बहुत प्राचीन सती प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाई थी।
सोचो कितनी घिनौनी प्रथा थी वो?
बहुत पुरानी थी और इसलिए पवित्र भी थी।
लेकिन लोगो का इसमें अटूट विशवास था।
मुझे आपका अपने ग्रंथो में,
और संतो में जो अटूट विश्वास भी कुछ ऐसा ही लगता है
लेकिन आप मेरा विरोध करते हो।
विरोध तो राजा राम मोहन राय का भी आपने बहुत किया था।
 
अब अगर आप, सती प्रथा जैसि
घिनौनी प्रथा को नहीं समझ पाए
जो समझनी अति सरल थी
तो आप मेरे कहने से
ग्रन्थ और संत और फ़क़ीर कैसे छोड़ सकते हो?
जब आपको सती जैसी इतनी साधारण बात समझ नहीं आई
तो अल्लाह/भगवान् की निर्थकता को मैं आपको कैसे समझाऊं।
यह तो बहुत सूक्ष्म विषय है।
 
सती प्रथा को तो एक मूर्ख से मूर्ख भी यह कह सकता था
कि यह पाप है लेकिन अल्लाह या भगवान् का मामला
तो बहुत पेचीदा है, कैसे समझोगे आप?
जब आपको सती प्रथा नहीं समझ आई
तो अल्लाह या भगवान् समझ आने का तो मतलब ही नहीं।
जैसे लोग सती को बिलकुल जायज मानते थे
वैसे ही आप संतो को जायज मानते हो।
 
यही आपको समझाना मेरी लिए बहुत बड़ी चुनौती है।
अब जब अंग्रेजों ने सती प्रथा को बैन कर दिया
तो सारा देश उनके विरोध में खड़ा हो गया
और हारकर अंग्रेजो को वह सती प्रथा का कानून ढीला करना पड़ा।
फिर संशोधित कानून में यह प्रावधान किया गया
कि ठीक है सती प्रथा तो रहेगी
लेकिन आप किसी औरत को सती होने पर मजबूर नहीं कर सकते।
अगर उसने सती होना चाहे
तो अपनी मर्जी से होगी।
 
अब बताओ आपकी समझ पर कैसे विश्वास करे।
सिर्फ 50 साल पहले आप ऐसे थे
कि यह सोचकर घृणा होती है
कि कितनी घटिया मानसिकता थी वह।
और वह भी जब आपके सारे देवता,
सारे फ़क़ीर, सारे गुरु, सारे ग्रंथ आपके पास थे।
तो फिर कैसे विश्वास करे कि आपकी सोच ठीक होगी।
वही ग्रन्थ और देवता और गुरु आपके पास तब थे,
वही आज भी हैं।
 
और आपकी सोच में तब से लेकर
कोई मूलभूत बदलाव भी नहीं आया।
आज भी आपके जीवन में समस्याएं ही समस्याएं हैं,
समाधान कोई भी नहीं।
थोड़ा विचार करो दोस्तों,
कहीं ना कहीं आपकी मान्यताएं, धारणाएं गलत हैं।
देखिए, आप अपने गुरुओं, फकीरों, संतो पर तभी गर्व कर सकते है
जब आपने इनका कोई फायदा उठाया हो।
 
जब आप पहले से कई गुना ज्यादा बेईमान हो गए हो,
कई गुना ज्यादा भ्रस्ट हो गए हो,
कई गुना ज्यादा साम्प्रदायिक हो गए हो,
तो आप इन पर कैसे गर्व कर सकते हो?
आप इनको कैसे सही कह सकते हो
जब आपको इनका कोई फायदा ही नहीं हुआ।
 
अगर आप पहले से ज्यादा ईमानदार हो गए होते,
पहले से ज्यादा कर्मठ हो गए होते,
पहले से ज्यादा सच्चे हो गए होते,
तभी आपको यह कहने का शायद हक़ होता
कि आपके गुरु या ग्रंथ अच्छे है ।
मतलब कितना बड़ा ढोंग है हमारे जीवन में
यह सोच कर मेरी तो रूह कांप जाती है #bTr
Joga Singh
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