अनुशासन थोपा जाता है

अगर बच्चे को यह आजादी दी जाये कि आज स्कूल जाना चाहो तो जाओ, नहीं जाना चाहते तो ना जाओ, तो क्या बच्चा स्कूल जायेगा अगर बच्चे को यह विकल्प दिया जाये कि आप चाहो तो कक्षा में बैठो, और न चाहो तो बाहर कैंटीन पर बैठकर मित्रो के साथ चाय भी पी सकते हो।
तो क्या बच्चा फिर भी कक्षा में बैठेगा?  नहीं बैठेगा! तो फिर आप अनुशासन किसको कहते हो?  जिसको आप अनुशासन कहते हो वह थोपा हुआ अनुशासन है। यह अनुशासन नहीं बल्कि एक रूल का रूप ले चुका है। अनुशासन आप उसको कह सकते है जो बाहरी प्रभाव के बिना भी बना रहे।

हमारा धर्म नकली है

हमारे जीवन में सारी गतिविधियां ऐसे ही झूठी है, नकली है। पत्नी पति के साथ सिर्फ इसलिए जी रही है क्योंकि कोई और अच्छा विकल्प नहीं है और आप इसको प्यार कहते हो। इसको बड़ी गहनता से देखने की जरूरत है और फिर आपको समझ आएगा कि हम रूल किसको कहते है और आपको फिर समझ आएगा की सारा धर्म और प्यार अनुशासन की तरह ही नकली है और फिर आपको समझ आएगा कि समाज में हर चीज गलत क्यों हो रही है?

हमारी शादी भी नकली है

अगर आप गहराई में जाकर देखोगे तो आप पाओगे कि हमने सारे गुरु, फ़क़ीर और ग्रन्थ अपनी वजह से नहीं पकडे हुए, बल्कि इनको समाज की वजह से पकड़ा हुआ है। यहाँ तक एक औरत जिस आदमी के साथ सारी उम्र गुजार देती हैहो सकता है वह उसकी अपनी मर्जी ना हो। हो सकता है वह सारी उम्र एक गलत आदमी के साथ गुजार कर चली जाये लेकिन उसको आखिर तक इस सच का पता ही नहीं चलता।

संत और महापुरुष आप पर थपे गए है

आज भी 90 % लड़कियां अपनी शादी माँ-बाप के दबाव में करती है तो फिर आपको कैसे पता कि जिससे आप शादी कर रही है वही आपके लिए सही है। जब चुनाव ही गलत है तो परिणाम कैसे सही आ सकते है?  जब शुरुवात ही गलत है तो अंत कैसे सही हो सकता है ऐसे ही मैं कहता हूँ कि सारे संत और गुरु और महापुरुष आपके जीवन में गलत बैठे है क्योंकि आपने उनको अपनी मर्जी से कभी चुना ही नहीं।
वो थोपे गए है।

बहुत बार असफलता मिलेगी

यही कारण है उनकी कोई शिक्षा आपके जीवन में नजर नहीं आती। लोग यह बात तो बड़ी आसानी से कह देते है की संतो का क्या दोष,लेकिन जो मूलभूत त्रुटि है उसको देखते नहीं सिर्फ अपनी मर्जी का संत भी एक झटके में कभी नहीं चुना जाएगा। कई बार प्रयास करने होंगे। बहुत बार असफलता मिलेगी। इस छोड़ने में, पकड़ने में ही सारा अध्यात्म छिपा है।

सही चीज तक पहुँचने के लिए बहुत से प्रयोग करने होंगे

इसी से लोग डरते है। इसलिए बस एक को ही कसकर पकड़ लेते है। आपने देखा होगा कैसे हम रेडियो का सही स्टेशन लगाने के लिए कभी बटन को आगे ली जाते है कभी पीछे और सुई को ध्यान से देखते रहते है। एक ही झटके में सुई सही जगह नहीं पहुँचती। कई बार बटन (ट्यूनर) को आगे पीछे घुमाना पड़ता है। ऐसे ही सही गुरु आपके लिए कौन है, इसके लिए बहुत से प्रयोग करने पड़ेंगे। जो विरासत में मिला है उसी को लपक लेना सारे सच की हत्या करने जैसा है।