कचरे की हम कभी छंटनी नहीं करते

मैं हर साल अपनी किताबो, कागजो और सामान की छटनी करता हूँ और हर साल बहुत सा सामान ऐसा निकलता है जिसकी अब जरूरत नहीं होती और उसको फेंक दिया जाता है I फालतू किताबो को लाइब्रेरी में दे दिया जाता है I ऐसा करने से जीवन में काफी नवीनता आती है और हर बार हैरानी होती है कि इस बार भी कितना व्यर्थ का माल निकल आया I लेकिन उस मन का क्या जिसके अंदर हजारो सालो पुराना कचरा भरा पड़ा है और इस कचरे से निजात पाने का हमारे पास कोई साधन भी नहीं I इस कचरे की हम कभी छंटनी नहीं करते I

विचार कभी मरता भी नहीं

हर विचार जो हमारे मन में आता है वह हमारे मनस्पटल पर बड़ी गहरी छाप छोड़ता है और यह विचार कभी मरता भी नहीं I यह विचार हमेशा हमारे मन के किसी कोने में पड़ा रहता है और हमारे जीवन को किसी न किसी तरह से प्रभावित करता रहता है I यही कारण है कि आदमी एक समाजिक प्राणी होने के नाते आजतक कुछ ज्यादा बदला नहीं क्योंकि पुराने विचार ही हमें संचालित करते रहते चले आ रहे है I परिणामस्वरूप आदमी पहले भी लालची, हिंसक, साम्प्रदायिक और बेईमान था और आज भी है I